मेरी कविता,मेरी ज़ुबानी

मैं बादल हूँ...

मैं बादल हूँ, बहता हूँ हवाओं संग कहीं,
मन करता है सिमट जाऊँ, बन जाऊँ एक वहीं।
मगर जब भी खुद को समेटने की करता हूँ चाह,
बरस पड़ता हूँ मैं, बनकर अश्रु की एक राह।

कभी पर्वतों से टकरा, खुद में ही टूट जाता हूँ,
क्षितिज के पार जाकर भी, खुद को ही छूट जाता हूँ।
एकजुट होने की चाह में हर बार बिखरता हूँ,
मैं बादल हूँ, थमता नहीं—हर पल बदलता हूँ।

No comments:

Please do not enter any spam link in the comment box.

Powered by Blogger.