मैं बादल हूँ...

बादल हूँ मैं, हर लम्हा रवानियों में हूँ,
कभी ख़ामोश, कभी तेज़ तूफ़ानों में हूँ।

चाहत है मेरी कि खुद को समेट लूँ कहीं,
मगर जब भी समेटा, बरस गया वहीं।

पहाड़ों से टकरा के, चूर हो जाता हूँ,
अपने ही अश्कों में खुद को डूबाता हूँ।

इकजुटी का ख्वाब हर रोज़ सजाता हूँ,
पर हर बार उसी में खुद को मिटाता हूँ।

बादल हूँ मैं, ना ठहरने की कसम खाई है,
हर एहसास में भीगने की आदत पाई है।

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