छाया की सरगुशियाँ


चाँदनी रात, सूनी डगर,
झाड़ियों में कुछ बोले मगर।
धीमे-धीमे बढ़ते पाँव,
कानों में गूंजे डर के गान।

सूखे पेड़ की टेढ़ी डाल,
लटके हैं जैसे कोई खाल।
दरवाज़ा खुद से खुलता है,
कोई साया पास निकलता है।

ना चेहरा, ना कोई नाम,
बस ठंडी साँसें और बदनाम।
हर रात वो चलती आती,
छत पर छाया सी मंडराती।

कहते हैं वो पूछती एक बात—
"क्या तुमने देखा मेरा साथ?"

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